Jaipur के प्राइवेट अस्पताल की लूट : 6 दिन में बनाया 1.83 लाख का बिल, न ऑक्सीजन चढ़ी, न रेमडेसिविर लगा,1.18 लाख रुपए चुकाए फिर भी स्कूटी कर ली जब्त ।

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जयपुर के सीतापुरा स्थित एक अस्पताल से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है जहां अस्पताल प्रशासन ने मानवता को तार-तार करते हुए कोरोना का हाल में लूट की सारी हदें पार कर दी यहां तक की मरीज के परिजनों की स्कूटी तक को जप्त कर लिया करुणा महामारी में लोग जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं वहीं निजी अस्पताल संचालक इस आपदा की घड़ी को लूट के अवसर में बदलने में पीछे नहीं है । निजी अस्पताल अस्पतालों में भर्ती मरीजों की परिजनों को मौत का खौफ दिखाकर हजारों लाखों रुपए की चांदी काट रहे हैं किसी मरीज के पास अगर पैसा कम है तो उसे गंभीर हालत में भी यह निजी अस्पताल डिस्चार्ज करने से नहीं चूक रहे हैं मरीज की चाहे जो मजबूरी हो लेकिन अस्पताल की लूट का पैसा जमा कराना जरूरी है इसके लिए चाहे अस्पताल प्रशासन को मरीज की परिवार का घर गिरवी रखना पड़ेगा मरीज के तीमारदार का वाहन जप्त करना पड़े लेकिन पैसा तो अस्पताल प्रशासन लेकर ही रहेगा ऐसा ही एक मामला जयपुर के सीतापुरा के पास महावीर कॉलोनी इंडिया गेट स्थित भानू अस्पताल का सामने आया है।

सीतापुरा स्थित अस्पताल में 6 दिन पूर्व अपने पिता की तबीयत खराब होने पर भर्ती करवाया था लेकिन मरीज की हालत इतनी भी गंभीर नहीं थी कि जिसे रेमडिसिवर और ऑक्सीजन की जरूरत नही पड़ी फिर भी एक युवक की स्कूटी को अस्पताल संचालक ने जब्त कर लिया और 50 हजार रुपए देने पर छोड़ने की बात कही।

न तो दवाइयों की संख्या लिखी और न बैच नंबर और न ही एक्सपायरी डेट।

जब मरीज के परिजन ने अस्पताल संचालक से दवाइयों का बिल मांगा तो उस बिल में न तो दवाइयों की संख्या लिखी और न बैच नंबर और न ही एक्सपायरी डेट।

पीड़ित युवक हेमंत रावत ने बताया कि उनके पिता मोहन सिंह (53) को covid होने के बाद 7 मई को भानू अस्पताल में भर्ती करवाया। भर्ती होते ही डॉक्टर ने स्थिति गंभीर बताते हुए ICU में शिफ्ट करने की बात कही और ऑक्सीजन का बंदोबस्त करने के लिए कह दिया। आईसीयू का चार्ज 6 हजार रुपए प्रतिदिन और डॉक्टर की फीस एक हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से तय हुई, जबकि दवाइयों और जांचों का अलग से चार्ज देने की बात कही गई। 6 दिन भर्ती रहने के बाद अस्पताल संचालक ने मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाने की बात कही और बकाया 65 हजार रुपए जमा करवाने के लिए कह दिया। इस दौरान जब बिल मांगे तो बिल बाद में देने की बात कही। पैसे नहीं देने पर अस्पताल संचालक ने स्कूटी को जब्त कर लिया।

6 दिन में बना दिया 1.26 लाख की दवाइया उसमें भी न तो बैच नंबर और न ही एक्सपायरी डेट

हेमंत ने बताया कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर जब बिल थमाया तो पांव तले से जमीन किसक गईं,अस्पताल ने फाइनल बिल 1 लाख 83 हजार 782 रुपए का बनाकर थमा दिया। इसमें 6 दिन के अंदर 1 लाख 26 हजार रुपए तो केवल दवाइयों का ही बिल बताया। इसके अलावा 36 हजार रुपए बेड के चार्ज, 6 हजार रुपए डॉक्टर फीस, 12,670 रुपए की जांच और इसके अलावाा 3 हजार रुपए प्रोसिजर के नाम पर बिल में जोड़े गए। मेडिकल बिल जब देखे तो न तो उसमें दवाइयों (इंजेक्शन आदि) की एक्सपायरी डेट और बैच नंबर का जिक्र था और न ही उनकी संख्या। इलाज के दौरान एंटीबायोटिक, उल्टी-बुखार रोकने के इंजेक्शन और स्टेरॉयड दिए गए।

अस्पताल के बाहर खड़ी जब्त स्कूटी,दर दर भटके इलाज के लिए पर सब जगह लूट

मरीज को गंभीर हालत में ही डिस्चार्ज करने के बाद मरीज के परिजन इलाज के लिए दूसरे निजी अस्पताल भी गए वहां एक दिन भर्ती भी करवाया लेकिन इस अस्पताल के हालात भी ठीक वैसे ही थे झोटवाड़ा स्थित मरुधर अस्पताल में 1 दिन के लिए भर्ती कराया लेकिन वहां की पीस 1 दिन की ₹50000 ₹रुपए इतना खर्च उठाना संभव नहीं होने पर मरीज को फिर घर पर ले आए 2 दिन घर पर रखने की आवाज 17 मई को सुबह आर यू एच एस में भर्ती करवाया गया पीड़ित का कहना है कि पैसे नहीं है ऐसे में निजी अस्पताल में इलाज तो बहुत दूर की बात है अस्पताल के बाहर जब स्कूटी को भी छुड़वाना नामुमकिन लग रहा है लेकिन खुशी की बात यह है कि आर यू एच एस में ऑक्सीजन बेड मिलने से अब पिता का इलाज संभव हो पाएगा

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