संसार के पालनहार श्री कृष्ण के वास्तविक स्वरूप का दर्शन है ..भगवान गोविन्द देव जी …जिनका मनोहारी विग्रह भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपनी दादी की देख रेख में तैयार करवाया था …

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देश के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में गोविंद देवजी का मंदिर एक है…….जयपुर के आराध्य गोविंद देवजी भगवान श्री कृष्ण का ही स्वरूप है…..राजमहल सिटी पैलेस के उत्तर में स्थित गोविंद के दरबार में… प्रतिदिन हजारों की संख्या में भक्त आते हैं…..गोविंद देवजी राजपरिवार के भी दीवान अर्थात मुखिया स्वरूप हैं……जयपुर वासियों के मन में गोविंद देवजी के प्रति अशीम श्रद्धा है………

जयपुर वासियों के हर्दय सम्राट है प्रभु राधा गोविन्द देव जी

ब्रहम मुहर्त की मंगला झांकी से लेकर… शयन झांकी तक… हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र.. आराध्य गोविंद देव जी मंदिर…..वैसे ठाकुरजी विराजमान तो मंदिर में है लेकिन बसते ये जयपुर वासियों के ह्रदय में हैं…..हजारों की संख्या में प्रतिदिन और लाखों की संख्या में उत्सवों पर भक्तों की भीड यहां हाजरी लगाती है….जयपुर के ईष्टदेव तो ये है ही…लेकिन बंगाल, बिहार, मणिपुर, आसाम और अन्य राज्यों सहित…. विदेशों से भी भक्त ठाकुर जी के चरणों में सिर नवाने जरूर आते हैं….वही .कलाकार ठाकुरजी गोविंददेवजी के सामने अपनी हाजिरी लगाए बिना अपनी कला को अधुरा मानते हैं…..दिन प्रतिदिन इसकी आस्था बढती ही जा रही हैं……भक्त अपने दिन की शुरूआत आराध्य के दर्शन से करते है …..भगवान कृष्ण के भक्त मथुरा,वृंदावन और द्वारका के साथ ही बड़ी संख्या में जयपुर में स्थित गोविंद देवजी के मंदिर भी पहुंचते हैं… इस मंदिर में गोविंद देवजी की मूर्ति को भगवान कृष्ण की सबसे सुंदर और आकर्षक प्रतिमा माना जाता है……यह मंदिर सुबह 5 बजे मंगला आरती और मधुर भजनों के साथ भक्तों के लिए खुलता है……इस मंदिर में हर दिन 7 बार भगवान की आरती होती है और भजन गाए जाते हैं…

दिन में 8 बार लगता है ठाकुर जी के विभिन्न व्यंजनों का भोग

मंगला से लेकर शयन झांकी तक ठाकुरजी को आठ बार लगने वाले भोग में विभिन्न पकवान अर्पित करते हैं…….अन्नकूट और व्यंजन द्वादशी को छोड़कर विशेष तिथियों और त्योहारों पर भी विशेष पकवान राधा-गोविंददेवजी को भोग में अर्पित किए जाते हैं…….राधाजी को खासतौर पर अरबी की सब्जी पसंद होने के कारण वृंदावन की तरह ही राधा अष्टमी पर विशेष रूप से भोग में शामिल की जाती है……..इसी तरह प्रतिदिन शृंगार झांकी में मावे और चीनी से बनी बंगाल की विशेष मिठाई खीरसा और मीठे आलू से बनाई गई मिठाई पीठे अर्पित करते हैं…….आलू और खसखस से बनाई जाने वाली खास सब्जी भी भोग में शामिल करते हैं…..लेकिन ठाकुरजी के भोग में गोभी, टमाटर, गाजर और जमीकंद शामिल नहीं किया जाता है……

भगवान श्री कृष्ण का वास्तविक स्वरूप है गोविन्द देव जी 

.इतिहासविदें और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने ये तीनों विग्रह बनवाए थे…….. बज्रनाभ की अपने पितामह श्रीकृष्ण के प्रति खासी श्रद्धा थी…. और उसने मथुरा मण्डल में श्रीकृष्ण जी की लीला स्थलियों का ना केवल उद्धार किया……बल्कि उनका साक्षात विग्रह बनाने का निश्चय किया…….बज्रनाभ की दादी ने भगवान श्रीकृष्ण को देखा था………दादी के बताए अनुसार बज्रनाभ ने श्रेष्ठ कारीगरों से विग्रह तैयार करवाया…….इस विग्रह को देखकर बज्रनाभ की दादी ने कहा, कि भगवान श्रीकृष्ण के पांव और चरण तो उनके जैसे ही हैं, पर अन्य बनावट भगवान श्री से नहीं मिलते हैं………..बज्रनाभ ने इस विग्रह को मदन मोहन जी का नाम दिया……..यह विग्रह करौली में विराजित है……..बज्रनाभ ने दूसरा विग्रह बनवाया, जिसे देखकर दादी ने कहा कि इसके वक्षस्थल और बाहु भगवान स्वरुप ही है……..शरीर के दूसरे अवयव भगवान श्रीकृष्ण से मेल नहीं खाते हैं………इस विग्रह को बज्रनाभ ने भगवान श्री गोपीनाथ जी का स्वरुप कहा…….भगवान का यह स्वरुप पुरानी बस्ती में भव्य मंदिर में विराजित है….. दादी के बताए हुलिये के आधार पर तीसरा विग्रह बनवाया गया तो उसे देखकर बज्रनाभ की दादी के नेत्रों से खुशी के आसूं छलक पड़े और उसे देखकर दादी कह उठी कि भगवान श्रीकृष्ण का अलौकिक, नयनाभिराम और अरविन्द नयनों वाला सुंदर मुखारबिन्द ठीक ऐसा ही था……ये है जयपुर के राजा गोविंददेवजी

गोविन्द देव जी का इतिहास

आमेर के राजा मानसिंह ने वृन्दावन में बनवाया था 7 मंजिला गोविन्द देव जी का मंदिर

गोविंददेवजी मंदिर के प्रवक्ता मानस गोस्वामी बताते हैं की … वृंदावन में गोविन्द देव जी मंदिर का निर्माण ई. 1590 (सं.1647) में श्रीरूप गोस्वामी और सनातन गुरु, श्री कल्यानदास जी के देख रेख में हुआ…वृन्दावन में .श्री गोविन्द देव जी के सात मंजिला भव्य मंदिर निर्माण आमेर के राजा भगवान दास के पुत्र राजा मानसिंह ने करवाया था…….वृन्दावन में गोविन्द देव जी ,राधा गोविन्द जी और मदन मोहन जी के विग्रह स्थापित किये गए थे ,इनमे गोविन्द देव जी का मुखारबिंद ,राधा गोविन्द जी का वक्षस्थल और मदन मोहन जी के विग्रह में चरण भगवान कृष्ण के स्वरूप से हु ब हु मेल खाते है…भगवान श्री कृष्ण के इन मनोहारी स्वरूप के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु दूर दूर से आते थे,सात मंजिला मंदिर के शिखर पर विशाल दीपक की रोशनी दिल्ली तक नजर आती थी ,

गगनचुम्बी आकाशदीप को देखकर आक्रान्ता ओराग्जेब ने मंदिर नष्ट करने के दिए आदेश

वृन्दावन दिल्ली के समीप होने और यहाँ भगवान श्री कृष्ण के प्रति आस्था से व्यथित मुग़ल आक्रान्ता मुस्लिम सम्राट औरंगजेब ने वृन्दावन के हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश दिया,कार्तिक मास में मंदिर पर जलने वाले आकाश दीप की रोशनी देख व्यथित था आक्रान्ता , तब पुजारी शिवराम गोस्वामी और भक्त मिलकर गोविन्द देव जी के सभी विग्रहो को सुरक्षित मंदिर से निकाल कर भरतपुर के पास जंगलो में चले गए। 15 वर्षो तक शिवराम गोस्वामी और भक्त भरतपुर के जंगलो में विग्रहो के साथ रहे इस दौरान इन विग्रहो को कामवन (कामा)में सुरक्षित रखा,इस दौरान आमेर के तत्कालीन राजा रामसिंह को इसकी जानकारी मिली और राजा रामसिंह ने इन विग्रहो की सुरक्षा का जिम्मा लिया,राजा राम सिंह इन विग्रह को सुरक्षित मुग़ल आक्रांताओ की निगाह से बचाते हुए कामवन से आमेर तक लेकर आये इस दौरान रास्ते में कही स्थानों पर रात्रि विश्राम किया गया,जहा जहा इन विग्रहो को लेकर विश्राम किया गया उन सभी स्थानो पर स्थानीय नागरिको ने मंदिर का निर्माण करवाय आमेर की कनक घाटी में जंगलो के बीच भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर गोविन्द देव जी की प्राण प्रतिष्ठा की, इस स्थान को आज कनक वृन्दावन के नाम से प्रसिद्ध है, और यही आराध्य गोविन्द देव का प्राचीन मंदिर है,कई वर्षो तक गोविन्द देव जी यही पर विराजमान रहे ,उसके बाद सवाई जयसिंह ने जयपुर बसाया ,जयपुर बसने के बाद गोविन्द देव जी के विग्रह को चन्द्र महल के समीप जय निवास उधन में बने सूर्य महल में गोविन्द देव जी को प्रतिष्ठित किया गया ,अब मूल देवता जयपुर में है… कहा जाता है कि इस दौरान गोविंद देव जी जयसिंह के सपने में आए और कहा कि मुझे ऐसी जगह रखो जहां जनता मेरे दर्शन कर सके…..इस दौरान ठाकुर जी ने अपनी स्थापना की जगह भी बताई….. जिसके बाद गोविंद देव जी की मूर्ति को जयपुर परकोटे के विराजमान किया गया   

.बाद में उड़ीसा से राधारानी का विग्रह श्री गोविन्द देवजी के साथ प्रतिष्ठित किया गया….चैतन्य महाप्रभु की गौर-गोविन्द की लघु प्रतिमा को भी श्री गोविन्द देवजी के पास ही विराजित किया है…..श्री गोविन्ददेवजी की झांकी के दोनों तरफ दो सखियां खड़ी है। इनमें एक विशाखा सखी जो सवाई जयसिंह ने बनवाई थी……राधा-रानी की सेवा के लिए यह प्रतिमा बनवाई गई…….दूसरी प्रतिमा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाई……यह ललिता सखी है, जो भगवान श्री गोविन्ददेवजी की पान सेवा किया करती थी। उस सेविका के ठाकुर के प्रति भक्ति भाव को देखते हुए ही सवाई प्रताप सिंह ने उनकी प्रतिमा बनाकर विग्रह के पास प्रतिस्थापित की….

भगवान कृष्ण के संग राधा के ऐसे स्वरूप  के दर्शनों का सौभाग्य जयपुर में प्राप्त होता है जहां पहुंच कर कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती और जीवन धन्य हो जाता है……जयपुर में आज भी गोविंद देव जी को राजा की तरह पूजा जाता है और एक राजा की ही तरह भव्य श्रृंगार किया जाता है…..

गुलाबी शहर के सिटी पैलेस में स्थित सूरज महल और विशाल बगीचे में गोविंद देव जी मंदिर भगवान कृष्ण के गोविंद रुप को समर्पित है……..जयपुर के आराध्य गोविन्द देवजी का विग्रह (प्रतिमा) भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरुप है………पौराणिक इतिहास, किवदंतियों और कथाओं की मानें तो यह कहा जाता है कि श्रीगोविन्द का विग्रह हूबहू भगवान श्रीकृष्ण के सुंदर और नयनाभिराम मुख मण्डल और नयनों से मिलता है…….

भगवान श्रीकृष्ण के तीन विग्रह बनाए गए……तीनों विग्रह ही राजस्थान में है…….दो विग्रह तो जयपुर में है और तीसरे विग्रह करौली में श्री मदन मोहन जी के नाम से विख्यात है……..जयपुर में श्री गोविन्द देवजी के अलावा श्री गोपीनाथ जी का विग्रह है…….यह विग्रह भी उतना ही पूजनीय और श्रद्धावान है, जितने गोविन्द देव जी और मदन मोहन जी का विग्रह है………तीनों ही विग्रह भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात स्वरुप माने जाते हैं……

श्रीगोविन्द देव जी के दर्शन करने सैंकड़ों की संख्या में भक्त यहां दो समय हाजिरी देते हैं….जन्माष्टमी के अवसर पर यहां लाखों की संख्या में भक्त भगवान गोविंद के दर्शन करते हैं……भगवान कृष्ण के भक्त मथुरा,वृंदावन और द्वारका के साथ ही सबसे बड़ी संख्या में गोविंद देवजी के मंदिर में पहुंचते हैं…..इस मंदिर में स्थित गोविंद देवजी की मूर्ति को भगवान कृष्ण की सबसे सुंदर और आकर्षक प्रतिमा माना जाता है……यह मंदिर सुबह 5 बजे आरती और मधुर भजनों के साथ भक्तों के लिए खुलता है…..इस मंदिर में हर दिन 7 बार भगवान की आरती होती है और भजन गाए जाते हैं….

जयपुर राजपरिवार के लोग तो श्रीकृष्ण को राजा और खुद को उनका दीवान मानकर सेवा-पूजा करता रहा है……. ठाकुरजी की झांकी अत्यधिक मनोहारी है……जयपुर घूमने आए हर पर्यटक भगवान श्रीगोविन्द देव जी के दर्शन करने जरुर आते हैं। ऐसा ही कुछ आकर्षण भगवान श्री गोपीनाथ जी और श्री मदन मोहन के विग्रह का है, जो भक्तों को अपने साथ बांधे रखता है……कहा जाता है कि इन तीनों विग्रहों के दर्शन एक दिन में ही करने को काफी शुभ माना जाता है….

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