हिन्दू मुस्लिम एकता का केन्द्र अजमेर

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    अजमेर का इतिहास

    प्राचीन शहर अजमेर का नाम “अजय मेरु” है, जिसका मोटे तौर पर “अजेय पहाड़ी” के रूप में अनुवाद किया जा सकता है। कई पर्यटन स्थलों के साथ ही, अजमेर भारतीय संस्कृति और नैतिकता की विविधता का एक आदर्श प्रतिनिधित्व करता है, अजय मेरु शहर की स्थापना राजा अजयपाल चौहान ने 7 वीं शताब्दी ईस्वी में की थी और यह शहर 12 वीं शताब्दी ईस्वी तक चौहान राजवंश के राजाओ का अधिपत्य रहा। आज इस शहर को अजमेर के नाम से जन जाता है। अजमेर के नाम एक और ख्याति है की भारत में पहाड़ो पर किला बनाने की शुरुआत चौहान राजवंश द्वारा की गई थी।चौहान राजवंश ने पहला किला अजमेर में बनवाया था। जिसे तारागढ़ के नाम से जाना जाता है।  

    धार्मिक नगरी है अजमेर  

    अजमेर धार्मिक नगरी के नाम से भी विश्वविख्यात है।एक और हिन्दू आस्था का केन्द्र पुष्कर राज है तो दूसरी और गरीब नवाज की दरगाह पुरे विश्व को एकता का सन्देश देती है। दरगाह सरीफ के कारण मुगल सुल्तानों को अजमेर विशेष रूप से पसंद आया। 1616 में मुगल राजा जहाँगीर और इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के राजदूत, सर थॉमस रो के बीच पहली बैठक की मेजबानी अजमेर ने ही की थी।


    देशी विदेश पर्यटकों का केन्द्र

     धर्म, समुदाय, संस्कृति आदि का एक सही मिश्रण प्रदर्शित करता है अजमेर, सद्भावना में समन्वय और भाईचारे का केन्द्र है। अजमेर हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए तीर्थस्थल होने के अलावा एक लोकप्रिय पर्यटन आकर्षण बना हुआ है।अजमेर को जैन धर्म के लिए भी काफी जाना जाता है और यहाँ एक अद्भुत स्वर्ण मंदिर है और जैन नसिया है। अंग्रेजो के शासन का केन्द्र होने से अजमेर में इसाई धर्म भी काफी फलाफूला। सूफी संत, ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती का अंतिम विश्राम स्थल होने से, दुनिया भर के मुसलमान अपनी मुरदे लेकर गरीब नवाज के डर पर है साल लाखो की तादात में पहुचाते है।यह शहर अना सागर की विस्तृत झील और अरावली की बीहड़ पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

    अंग्रेजी शिक्षा का पहला केन्द्र

    अजमेर एक प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र भी है। मेयो कॉलेज भारत के पहले स्कूलों में से एक था जिसने ब्रिटिश शैली की शिक्षा के लिए कदम रखा और अब अजमेर में घूमने के लिए लोकप्रिय स्थानों में से एक है।

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