श्री डिग्गी कल्याण जी मन्दिर,टोंक, राजस्थान

    0
    405

    अंधा न अंख्या,बाझन न बेटो,कोडीन न काया,निर्धन न माया दीज्यो म्हारा दिग्गी प्री का राजा !!

    राजस्थान के टोंक जिले के डिग्गी में स्तिथ है कल्याण का मन्दिर, इस मंदिर की स्थापना से एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। एक बार इंद्र के दरबार में अप्सराएं नृत्य कर रही थीं। इस दौरान अप्सरा उर्वशी हंस पड़ी। इन्द्र नाराज हो गए और उन्होंने उर्वशी को 12 वर्ष तक मृत्युलोक में रहने का श्राप दिया। उर्वशी मृत्युलोक में सप्त ऋषियों के आश्रम में रहने लगी। सेवा से प्रसन्न होकर सप्त ऋषियों ने उससे वरदान मांगने को कहा तो उर्वशी ने वापस इंद्रलोक जाने की इच्छा प्रकट की। सप्त ऋषियों ने कहा कि ढूंढाड़ प्रदेश में राजा डिग्व राज्य करते हैं और तुम उनके राज्य में निवास करों, मुक्ति की राह मिलेगी। उर्वशी डिग्व राजा के क्षेत्र में चन्द्रगिरि पहाड़ पर रहने लगी। जो वर्तमान में चांदसेन के डूंगर के नाम से प्रसिद्ध है। इस पहाड़ के नीचे सुंदर बाग था जहां उर्वशी रात में घोड़ी का रूप धारण कर अपनी भूख मिटाती थी। इससे बाग को उजड़ने लगा तो परेशान  राजा ने इस घोड़ी को देखते ही पकड़ने के आदेश दिए। संयोग से घोड़ी सबसे पहले राजा के पास से ही निकली तो राजा ने उसका पीछा किया।घोड़ी पहाड़ पर जाकर अप्सरा के रूप आ गई। जिसे देखकर राजा मुग्ध हो गए और उन्होंने उर्वशी को महल में रहने का निमंत्रण दिया।

    उर्वषी ने राजा डिग्व को अपनी कहानी सुनाई और राजा के महल जाने से पहले एक सर्त रखी की श्राप काल समाप्त होने पर उसे इन्द्र लेने आएंगे और डिग्व यदि इन्द्र को पराजित कर देंगे तो वह सदा के लिए महल में रहेगी लेकिन,ऐसा नहीं हुआ तो वह राजा को श्राप देगी। उर्वशी का श्राप काल समाप्त होते ही इन्द्र लेने आ गए और उन्होंने राजा के साथ युद्ध किया।इस युद्ध में भगवन विष्णु ने इंद्र की सहायता क और इस युद्ध में राजा डिग्व को हार का सामना करना पड़ा। शर्त के मुताबिक उर्वशी ने पराजित राजा को कोढ़ी होने का श्राप दिया। लेकिन, भगवान विष्णु ने राजा डिग्व को इस श्राप से मुक्ति की राह बताई। उन्होंने कहा कि कुछ समय बाद समुद्र में उन्हें मेरी यानि की विष्णु की मूर्ति मिलेगी, इसके दर्शन से श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। राजा समुद्र के किनारे रहने लगे। एक दिन उनकी नजर वहां एक मूर्ति पर पड़ी और वह श्राप मुक्त हो गए। तभी वहां एक और दुखी व्यक्ति आ गया। उसने भी मूर्ति को देखा तो संकट दूर हो गया। अब दोनों के बीच इस मूर्ति के उत्तराधिकारी को लेकर विवाद हो गया। तभी आकाशवाणी होती है कि जो व्यक्ति रथ के अश्वों के स्थान पर स्वयं जुतकर प्रतिमा को ले जा सकेगा, वही उत्तराधिकारी होगा। दूसरा व्यक्ति इसमें असफल रहा और राजा इसे अपने राज्य में लेकर आ गए। मूर्ति की स्थापना उस स्थान पर की जहां उनका इंद्र के साथ युद्ध हुआ था।

    डिग्गी कल्याण जी की प्रतिमा और राजसमन्द के नाथद्वारा में विराजमान श्रीनाथजी की प्रतिमा का एकसा स्वरूप है,ग्यारस और पूर्णिमा का यहाँ विशेष महत्त्व मन जाता है,हर साल श्रावण माह में कल्याण जी का लख्खी मेला आयोजित होता है।इस मेले के दौरान प्रदेश सहित देश के कई क्षेत्रो से यात्री अपनी मनोकामनाये लिए बाबा के दर्शन के लिए पैदल चलकर आते है,इन पैदल यात्रियों की संख्या लाखो में होती है,विशेषतौर पर जयपुर संभाग के हर गाँव से पैदल यात्री डिग्गी आते है,जयपुर दौसा,अलवर,सीकर से आने वाले यात्रियों के लिए जगह जगह भण्डारो का आयोजन किया जाता है,और हर धर्मावलम्बी इन यात्रियों के सेवा कर अपने आपको धनी पता है।      

    मन्दिर में दर्शन का समय:
    सुबह 4:30 बजे से रात 9 बजे तक खुला रहता है। दिन में भोग के समय दर्शन कुछ समय के लिए बन्द होते है।

    डिग्गी कल्याण जी मन्दिर स्थापना और रहस्य की जानकारी के लिए यह विडियो जरुर देखे !

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here